Thursday, September 22, 2022

56 साल बाद भी अनसुलझी है प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत की गुत्थी

- Advertisement -

कहते हैं कुछ राज़ वक्त के साथ हमेशा के लिए दफन हो जाते हैं। शायद यही हुआ प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आकस्मिक मौत की घटना में। भारत के पीएम की मौत विदेश दौरे पर होना कोई साधारण बात नहीं थी लेकिन इस मामले पर आजतक कोई भी पुख्ता जानकारी जांच एजेंसियों के हाथ नहीं लगी है।

पीएम शास्त्री की मौत को आज 56 साल पूरे हो गए हैं लेकिन सवाल अब भी बरकरार है कि क्या लाल बहादुर शास्त्री की मौत एक हत्या थी या नेचुरल।

- Advertisement -

पीएम की असमायिक मौत पर उठे सवाल

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रधानमंत्री शास्त्री की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। जबकि उनकी पत्नी ललिता देवी ने दावा किया था कि उनके पति की मौत किसी साजिश के तहत हुई थी। वरना उनका शरीर नीला क्यों पड़ता, उनके शरीर पर चकत्ते क्यों पड़ते। बता दें, लाल बहादुर शास्त्री की आकस्मिक मौत पर उनका परिवार पिछले कई सालों से सवाल उठाता रहा है लेकिन इस मसले का कोई ठोस हल आज तक ना उनको मिला है और ना ही जनता को।

- Advertisement -

मुगलसराय में जन्में शास्त्री

2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्म लेने वाले लाल बहादुर शास्त्री ने शुरुआत से ही गरीबी देखी थी। उनकी बचपन से ही इच्छा थी कि वे देश के लोगों के लिए कुछ करें। इस चीज़ का उन्हें बहुत पहले ही एहसास हो गया था कि भारत को अगर मज़बूत बनाना है तो उसके लिए यहां के किसानों को मजबूत करना होगा। यहां के जवानों को सक्षम बनाना होगा।

‘जय जवान जय किसान’ का किया उद्घोष

यही वजह थी कि साल 1965 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा देकर देश की जीत का विगुल फूंक दिया था। उनके आवाह्न पर लोगों ने साप्ताहिक उपवास ककी शुरुआत कर दी थी। जिसके बाद भारत के वीर सैनिकों ने दुश्मनों के सीने पर चढ़ाई करके पाकिस्तान के हाजी पीर और ठिथवाल पर कब्जा कर लिया।

ताशकंद समझौता

भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे इस नरसंहार को खत्म को करने के लिए सोवियत संघ ने समझौते का सुझाव आया। दोनों देशों के बीच मध्यस्तता कराने के लिए सोवियंत संघ ने जनवरी 1966 में ताशकंद में उच्च स्तरीय बैठक का आयोजन किया। इस चर्चा में भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान को न्योता भेजा गया।

10 जनवरी, 1966 को इस समझौते पर दोनों देशों को प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए और भारत ने हाजी पीर और ठिथवाल पाकिस्तान को वापिस लौटा दिया। इस समझौते को बाद में ताशकंद समझौते के नाम से जाना गया।

पीएम की मौत

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समझौते के अगली रात को पीएम शास्त्री की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। यह तारीख थी 11 जनवरी, 1966 इस रात को लेकर तमाम तरह के दावे किए गए, किसी ने पीएम की मौत को हत्या बताया किसी ने इसे प्राकृतिक मौत कहा लेकिन सच कभी सामने नहीं आया।

कमरे में था सबकुछ असामान्य

मशहूर लेखक और पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी किताब ‘बियोंड द लाइन’ में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा था कि शास्त्री जी को जहां ठहराया गया था, वो काफी बड़ा कमरा था। उसमें एक बड़ा सा बिस्तर था जिसके ऊपर शास्त्री लेटे पड़े थे। फर्श पर कालीन बिछा था। उसके ऊपर शास्त्री की चप्पल रखी हुई थी। देखकर लगता था, मानो इस्तेमाल ही न हुई हों। कमरे के एक ओर एक ड्रेसिंग टेबल था। उसके ऊपर एक थर्मस रखा था, औंधे मुंह पलटा हुआ। शायद शास्त्री जी ने उसे खोलने की कोशिश की थी। आमतौर पर ऐसे कमरों में घंटी लगी होती है। ताकि कमरे में ठहरे इंसान को कोई जरूरत हो, तो वो घंटी बजाकर किसी को बुला सके। मगर शास्त्री जी के कमरे में कोई घंटी भी नहीं थी।

ज़हर देकर की हत्या

इसके अलावा कुछ लोग दावा करते हैं कि जिस रात शास्त्री जी की मौत हुई उस रात को  उनका खाना उनके निजी सहायक रामनाथ ने नहीं, बल्कि सोवियत रूस में भारतीय राजदूत  टी एन कौल के कुक जान मोहम्मद ने बनाया था। कहा जाता है कि खाना खाकर शास्त्री सोने चले गए थे, उनकी मौत के बाद शरीर नीला पडने लगा जिससे आशंका जताई गई, कि शायद उनके खाने में जहर मिला दिया गया था।

राजनारायण कमिटी का गठन

गौरतलब है, दिवंगत प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत की असली वजह जानने के लिए साल 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने राज नारायण कमिटी का गठन किया। हालांकि, इस कमिटी की रिपोर्ट का क्या हिआ इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है। दिवंगत पीएम शास्त्री के संयुक्त सचिव रहे सीपी श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘ए लाइफ ऑफ ट्रुथ इन पॉलिटिक्स’  में लिखा है कि, सरकार द्वारा शास्त्रीजी की मौत पर जांच के लिए एक जांच समीति का गठन करने के बाद उसके निजी डॉक्टर आरएन चुघ और निजी सहायक रामनाथ की अलग-अलग हादसों में मौत हो गई। खास बात यह थी कि दोनों लोग शास्त्रीजी के साथ ताशकंद दौरे पर गए थे। लेखक के इस दावे से शक और अधिक गहरा गया।

अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों पर पड़ सकता है असर

वहीं, साल 2009 में फेमस राइटर अनुज धर ने आरटीआई दाखिल कर भारत सरकार से इस लाल बहादुर शास्त्री की मौत पर जवाब मांगा था। जिसपर पीएमओ की तरफ से कहा गया कि शास्त्री की मौत के दस्तावेज सार्वजनिक करने से देश के अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों खराब हो सकते हैं, इस वजह से जवाब नहीं दिया जा सकता। इसके बाद आरटीआई के दूसरे हिस्से को गृह मंत्रालय भेज दिया गया था।

 

 

- Advertisement -
RELATED ARTICLES

Most Popular