Thursday, April 18, 2024

इस ख़ास तरीके से होता है भारत के राष्ट्रपति का चुनाव, जानें ख़ास बातें

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राष्ट्रपति पद के चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. इन चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है. हर बैलेट पेपर पर राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे सभी कैंडिडेट्स का नाम प्रेषित होता है. वोट देने वाले लोग इस लिस्ट में अपने पसंदीदा कैंडिडेट के आगे क्रम अनुसार 1, 2,3 या 4 लिखते हुए कैंडिडेट्स की मार्किंग करते हैं.  इसी लिए इसे प्रेफरेंशल वोटिंग कहा जाता है.

किस रंग के बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है?

राष्ट्रपति चुनाव के दौरान सांसदों और विधायकों के बैलेट पेपर का रंग अलग अलग होता है. जहां एक तरह सांसदों के बैलेट पेपर का रंग हरा होता है वहीँ विधायकों के बैलेट पेपर का रंग गुलाबी होता है.  इसके साथ ही हर पोलिंग स्टेशन पर सांसद और विधायक एक ही रंग की स्याही और एक ही रंग के पेन का इस्तेमाल करते हैं. किसी और रंग की स्याही या पेन इस्तेमाल करने पर वोट अमान्य माना जाता है. यह एक सीक्रेट बैलेट होता है. अलग रंग का पेन इस लिए इस्तेमाल नहीं न्लाया जाता क्यूंकि इससे यह पता चलने का ख़तरा होता है कि किस विधायक या सांसद के किसे वोट दिया है. राष्ट्रपति के शुनावों में NOTA का इस्तेमाल भी नहीं होता.

राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए कितने वोट की जरूरत?

जीत के लिए कुल वैध वोटों की वैल्यू आधे से अधिक वोट होना जरूरी है. इसे कोटा कहा जाता है. अगर मान लें कि हर इलेक्टर ने वैध वोट डाला है. तो ऐसे में सांसदों के कुल वोट की वैल्यू 5,43,200 होगी वहीँ विधायकों के वोट की वैल्यू 5,43,231 होगी. इन दोनों वोटों को मिला दिया जाएय तो करीबन 10,86,431 वोट की वैल्यू बनेगी. इसी तरह जीत के लिए तकरीबन आधे से अधिक यानी 5,43,216 वोट चाहिए.

कैसे होती है वोटों की काउंटिंग?

वोटों की काउंटिंग के दौरान पहले चरण में पहली पसंद की मार्किंग वाले बैलेट की गिनती होती है. अगर कोई कैंडिडेट पहले चरण में ही वेटेज पा जाता है तो उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है. अगर पहले चरण में किसी कैंडिडेट को जीत का कोटा नहीं मिलता तो दुसरे चरण की काउंटिंग करी जाती है. दूसरे चरण में सबसे कमी वोट पाने वाले कैंडिडेट्स को रेस से बाहर कर दिया जाता है और उसके वोट अन्य कैंडिडेट को ट्रान्सफर हो जाते हैं. यह प्रक्रिया बार बार दोहराई जाति है और तब तक नहीं रूकती जब तक एक कैंडिडेट नहीं बचता.

इस बार किसका पलड़ा भारी है?

राष्ट्रपति चुनाव के लिए जिस तरह विपक्ष ने शुरुवात में जोश दिखाया था वह अब ढलता नजर आरहा है. चुनाव से पहले विपक्ष खुद इस बात से वाकिफ है कि सत्ता पक्ष की जीत होना तय है. दरअसल सत्ता में काबिज भाजपा ने मुम्रू को राष्ट्रपति पद का उमीदवार बनाकर महिला और ट्राइबल दोनों ही कार्ड खेल दिए हैं. जिससे कई राज्य धर्मसंकट में हैं.

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