Thursday, September 22, 2022

77 की उम्र में इस बुजुर्ग ने 56वीं बार में पास की दसवीं की परीक्षा, अब देंगे 12वीं का एग्जाम

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कहते हैं ‘जहां चाह है वहीं राह है’। इस कहावत को राजस्थान के एक बुजुर्ग ने साबित करके दिखाया है। उन्होंने 77 वर्ष की उम्र में 10वीं की परीक्षा पास करके सभी को सदके में डाल दिया है। इतना ही नहीं अब वे 12वीं के एग्जाम भी देने जा रहे हैं।

कहा जाता है ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती’। इस बात को सार्थक करके दिखाया है राजस्थान के जालोर थानाक्षेत्र के सरदारगढ़ गांव में जन्मे हुकुमदास वैष्णव ने। उनकी उम्र 77 साल है। पेशे से वे रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं।

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जानकारी के मुताबिक, भू-जल विभाग में हुकुमदास चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे। उन्होंने 56वीं बार में दसवीं की परीक्षा पास की।

फेल होने पर ठाना, पास होकर दिखाएंगे

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बता दें, साल 1962 में हुकुमदास ने पहली बार दसवीं की परीक्षा दी थी। इसमें उन्हें एक बार तो सप्लीमेंट्री मिली जबकि दूसरी बार वे फेल हो गए। इसपर उनके दोस्तों ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि तू कभी 10वीं पास नहीं हो पाएगा।

हुकुमदास बताते हैं, दोस्तों की इस चुनौती ने उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख दिया। इस पर उन्होंने फैसला किया कि चाहें जितने साल लग जाएं वे 10वीं पास होकर दिखाएंगे।

सरकारी कर्मचारी के पद पर तैनात

उन्होंने आगे बताया कि भू-जल विभाग में नौकरी लगने के बाद वे नियमित रुप से पढ़ाई नहीं कर पाते थे। इसलिए उन्होंने एक वॉलंटियर के रुप में परीक्षा में शामिल होने का फैसला किया। वे हर बार फेल हो जाते। ऐसा करते-करते साल 2005 में हुकुमदास रिटायर हो गए। अब तक वे 43 बार दसवीं की परीक्षा में भाग ले चुके थे लेकिन हर बार वे नाकामयाब होते थे।

56वीं बार में पास की दसवीं

नौकरी से रिटायर्मेंट के बाद उन्होंने स्टेट ओपन बोर्ड से कोशिश की। उनकी यह कोशिश आखिरकार रंग लाई। वर्ष 2019 में उन्होंने 10वीं की परीक्षा सेकेंड डिवीजन से पास की। उन्हें यह कामयाबी 56वीं बार में हांसिल हुई।

मालूम हो, दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद हुकुमदास ने 12वीं के एग्जाम देने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल में 12वीं कक्षा में कला वर्ग से 2021-22 सत्र के लिए आवेदन किया है।

लोगों के लिए बने प्रेरणास्त्रोत

गौरतलब है, 77 की उम्र में 55 बार फेल होने के बावजूद भी हुकुमदास ने हार नहीं मानी और वे डटे रहे जिसका परिणाम यह निकला कि आखिरकार वे पास हो ही गए। बुजुर्ग की यह कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा का माध्यम है जो किसी कार्य में एक या दो बार असफल होने के बाद हार मान लेते हैं।

 

 

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