Wednesday, August 3, 2022

जानिए कैसे आजादी की लड़ाई लड़ते हुए वलवंत पारेख ने ‘Fevicol’ को बनाया भारत का मशहूर ब्रांड

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जिन्दगी जीना आसान नहीं होता, बिना संघर्ष के कोई महान नहीं होता. आज हम बात करने  जा रहे है , भारत के फेविकोल मैन नाम से पुकारे जाने वाले Pidilite कंपनी के फाउन्डर बलवंत पारेख की. जिनके सोलुशन को पिछले 60 साल से भारत के साथ पूरी दुनिया में इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन जिस क्वालिटी के साथ ‘Fevicol’ की शुरुआत हुयी थी. वो आज भी बरकरार है, आइये जानते है कैसे भारत के इतने बड़े सोलुशन ब्रांड Pidilite को वलवंत पारेख जी ने इतना सफल बनाया..

वलवंत पारेख ( Balwant Parekh-Fevicol Man )

वलवंत पारेख वो शख्स है जिन्होंने आजादी के बाद भारत को अपने पैरों पर खड़ा करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. आज के समय में उनकी कम्पनी की सम्पत्ति करोड़ो में है, लेकिन इतने बड़े मुकाम तक पहुंचना उनके लिए इतना भी आसान नहीं था.

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वलवंत पारेख जी का जन्म सन् 1925 में गुजरात (Gujrat) के भावनगर (Bhavnagar) जिले में स्थिति महुवा नामक गाँव में हुआ था. बिजनेस करने के गुण तो पारेख जी के अंदर बचपन से ही थे. लेकिन समस्या ये थी की उनके परिवार वाले उन्हें वकील के रूप में देखना चाहते थे. हालाँकि उन्होंने परिवार की बात का सम्मान रखते हुए वकालत तो कर ली. लेकिन कभी वकालत नहीं की.

महात्मा गाँधी के विचारों का पड़ा गहरा असर

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वलवंत पारेख जी ने अपनी पढाई के साथ साथ गाँधी जी के कदमों से कदम मिलाकर चलना शुरू कर दिया. और लोगों को उनके अहिंसावादी मार्ग पर चलने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करने लगे. लेकिन पढाई पूरी होने के बाद उन्होंने लॉ प्रेक्टिस करने से साफ इंकार कर दिया.

दरअसल उनका मानना था वकालत करने बाद उन्हें झूठ बोलना पड़ता. लेकिन वो झूठ और फरेव से दूर रहना चाहते थे. यही वजह थी की उन्होंने वकालत छोड़ कर महात्मा गाँधी के आजादी दिलाने वाले आंदोलनों में शामिल होना सही समझा।

प्रिंटिंग प्रेस में मन नहीं लगा तो कर ली चपरासी की नौकरी

मुंबई आने के बाद उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए कुछ तो करना था. इसलिए उन्होंने मुंबई में ही एक प्रेस में नौकरी जॉइन कर ली. पर कुछ दिन काम करने के बाद उनका प्रेस में मन नहीं लगा तो उन्होंने लकड़ा व्यापारी के ऑफिस में बतौर चपरासी की नौकरी शुरू कर दी.

वलवंत जी अपने उसूलो के बड़े पक्के इंसान थे. क्योंकि इतनी बड़ी डिग्री लेने के बाद किसी के लिए भी चपरासी की नौकरी करना आसान काम नहीं होता. लेकिन उन्होंने अपनी मजबूरी को ताकत बनाते हुए उस व्यापारी के यहाँ बिजनेस चलाने के गुण सीखे. इसके साथ ही उन्होंने वहां रहकर कुछ व्यापारियों से संपर्क बनाना शुरू कर दिया.

विदेश यात्रा करने के दौरान आया खुद का व्यासाय खड़ा करने का आइडिया

वलवंत जी ने एक जगह नौकरी न करके समय समय पर कई  नौकरियां बदली. जिसके फलस्वरूप उन्हें कई बार विदेश जाने का मौका मिलने लगा. अपनी विदेश यात्रा के दौरान उन्होंने व्यापार की बारीकियों को सिखा. क्योंकि अब वो खुद का बिजनेस शुरू करना चाहते थे.  शुरुआत में वलवंत जी ने पश्चिमी देशों में साइकिल, एक्स्ट्रा नट्स और पेपर डाई जैसी चीजों का आयात करने का व्यापार शुरू कर दिया. आयात के काम से उनकी किस्मत ने उनके अच्छे समय का आरम्भ हो गया. इसके बाद उन्होंने अपने परिवार को भी अपने साथ रहने के लिए बुला लिया.

 

लेकिन उनके बिजनेस में उन्हें तगड़ा मुनाफा देश को आजादी मिलने के बाद मिला. जिसका फायदा हिन्दुस्तान को अपने पैरों पर खड़े होने में मिला. और आर्थिक तंगी से झुझ रहे भारत को थोड़ी राहत मिलना शुरू हो गयी.

इस तरह से हुयी भारत के स्वदेशी Fevicol कम्पनी PIDILITE की शुरुआत

अब बात कर लेते है की आखिर कैसे उनके दिमाग में भारत का स्वदेशी फेविकोल बनाने का आइडिया आया. दरअसल वलवंत जी का आयात का काम तो बहुत अच्छा चल रहा था. इस दौरान उनके दिमाग में लकड़ी को आपस में जोड़ने के लिए एक फार्मूला बनाने की आइडिया आया. क्योंकि उस जमाने में जानवरों की चर्बी से गोद बनाया जाता था,जिसे गर्म करने के बाद ही लकड़ी को आपस में जोड़ा जा सकता..

अब ऐसा करने में 2 मुख्य समस्यायें सामने आने लगी. जिसमें पहली ये थी की जानवरों की चर्बी से बना ये गोद ज्यादा टिकाऊ नहीं था. और दूसरी समस्या ये थी की इसे गर्म करने पर गोद में से बहुत गंदी स्मेल आती थी. जिससे कारीगरों को साँस लेने में समस्या होती थी. इसके साथ ही हिन्दू कारीगरों की भावनाएं भी आहात होती थी.

वलवंत जी ने इस समस्या को देखते हुए इसका सोलुशन निकालने का फैसला लिया. जिसके बाद उन्होंने काफी खोजबीन करने के बाद सिंथेटिक रसायन का फोर्मूला खोजा और उस पर परिक्षण करके एक खुशबु दार गोंद का अविष्कार कर दिया. जिसे उन्होंने जर्मन कम्पनी मेविकोल की तर्ज पर फेविकोल (Fevicol)  नाम दे दिया. फिर उन्होंने अपने भाई सुनील पारेख के साथ मिलकर साल 1959 में पिडिलाइट ब्रांड (Pidilite Industries) की शुरुआत कर दी.

फेविकोल (Fevicol) ने कर दी भारतीयों की जिन्दगी आसान

Fevicol आने के बाद से भारतीयों की जिन्दगी बहुत आसान हो गयी. जिसके फलस्वरूप वलवंत जी का अविष्कार बिना बदबू वाला गोद Fevicol  पुरे भारत में मशहूर हो गया. जिसका इस्तेमाल आम आदमी से लेकर लकड़ी के बड़े बड़े व्यापारी भी करने लगे. क्योंकि इसके इस्तेमाल से चीजें मजबूती के साथ जल्दी जुड़ जाती थी.

Fevicol की मांग बढ़ जाने की वजह से पिडिलाइट कंपनी का नाम बहुत बड़ा हो गया. यही वजह थी की Fevicol  बनाने वाली कंपनी पिडिलाइट ने धीरे धीरे कई सरे प्रोडक्ट्स को लांच करना शुरू कर दिया.जिसमें फेवीक्विक (Feviquick), एम-सील (M-Seal) जैसे प्रोडक्ट्स शामिल थे. जो Fevicol के बराबर प्रसिद्द हो गये.

Pidilite Industries में 200 से ज्यादा प्रोडक्ट्स ने हजारों लोगों दिया रोजगार

Pidilite Industries ने फेविकोल के निर्माण के साथ भारत के हजारों लोगों को रोजगार देने का काम किया. वर्तमान में पिडिलाइट कंपनी को अपने 200 से ज्यादा प्रोडक्ट्स के मुकाबले सबसे ज्यादा प्रॉफिट फेविकोल (Fevicol)  से ही होता है. 90 के दशक में फेविकोल (Fevicol) के सोफा वाला ऐड बहुत चला और इसी ऐड की वजह से फेविकोल नी पुरे भारत के लोगों के दिलों में एकी ख़ास जगह बनाई.

इस तरह Pidilite Industries ने सन 1997 में फेविकोल को भारत में टॉप 15 ब्रांड की लिस्ट में शामिल किया गया, इसी तरह बुलंदियों को छूते हुये 2004 में Pidilite Industries का टर्नओवर एक हजार करोड़ के पार पहुंच गया. जिसके बाद वलवंत जी ने 2006 में पिडिलाइट ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर अपने ब्रांड्स को बेचने का फ़ैसला किया. जिसके फलस्वरूप आज अमेरिका, थाईलैंड, दुबई, इजिप्ट और बांग्लादेश में कंपनी के कारखाने चल रहे है.

फेविकोल फाउंडर , fevicol founder

2013 में बलवंत पारेख (Balwant Parekh) जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया

एक सफल बिजनेस मैन होने के साथ वलवंत जी नेक दिल इंसान थे. उन्होंने कई लोगों को रोज़गार दिया, इसके साथ ही उन्होंने अपने गाँव में दो स्कूल, एक कॉलेज और एक अस्पताल भी खुलवाया. वही गुजरात की सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन करने के लिए उन्होंने दर्शन फाउंडेशन के नाम से एक गैर सरकारी संगठनन का भी उद्दघाटन किया. इस तरह फ़ोर्ब्स ने उन्हें एशिया के सबसे धनी बिजनेसमैन की लिस्ट में उन्हें 45वें स्थान पर रखा. बता दें उस समय उय्नी कुल संपति 1.36 बिलियन डॉलर थी.

इस तरह उन्होंने वकालत न करके अपने बचपन के सपने को न सिर्फ पूरा किया,  बल्कि विश्व भर में सम्मान के पात्र भी बने. लेकिन जीवन चक्र के आगे किसी की नहीं चलती. क्योंकि जिंदगी की आखिरी दौर बुढापा ही होता है. इस तरह से साल 2013 में भारत के Fevicol Man  (Balwant Parekh) स्वर्गलोक सिधार गये

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